संदेश

श्मशान घाट हादसा...क्या कहेंगे आप...?

 श्मशान घाट पर भीषण हादसा...20 की मौत..क्या कहेंगे आप..? उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद स्थित मुरादनगर श्मशान घाट में लोग दाहसंस्कार के लिए आये हुए थे। सभी लोग छत के नीचे खड़े थे। छत गिर गई और देखते-देखते बीस लोग काल के ग्रास में समा गए। जबकि और लोंगों के दबे होने की आशंका जताई गयी है। हालांकि राहत कार्य शुरू कर दिया गया है और चालीस लोंगों को मलबे में से बाहर निकाला जा चुका है। पुलिस का कहना है कि गाजियाबाद के थाना मुरादनगर क्षेत्र के उखलारसी गांव में एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर परिजन और सगे संबंधी मृत व्यक्ति को दाह संस्कार के लिए श्मशान घाट लेकर पहुंचे थे। परिजन मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर ही रहे थे तभी श्मशान घाट का लैंटर भरभरा कर गिर पड़ा। इसकी चपेट में आकर लगभग दो दर्जन से ज्यादा लोग दबे गये अब तक बीस लोगों की मौत हो चुकी है।  हादसे वाले दिन को सुबह साढ़े तीन बजे से सुबह आठ बजे तक बारिश हुई। बारिश का सिलसिला रुक रुककर जारी था। बताया जा रहा है कि जो भवन गिरा है, वह सिर्फ और सिर्फ दस साल पुराना था। जिसका निर्माण नगरपालिका ने किया था। तो क्या सरकारी विभाग द्वारा कराए ...

तुम शेर बन अड़े रहो....

 तुम शेर बन अड़े रहो.... कोरोना अभी गया नहीं... शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो शेरनी भी साथ हो, शावक भी पास हो बाहर हवा ठीक नहीं, निकलना उचित नहीं शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो...। दूध की मांग हो या सब्जी की पुकार हो भले राशन की कमी हो, तुम फिकर करो नहीं तुम निडर खड़े रहो, बिल्कुल डरो नहीं शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो। गालियां सुनते रहो, काम काज करते रहो चौका बर्तन से न डरो, घर में ही डटे रहो बीमार गर कोई भी हो, फोन कर दिया करो तुम शेर बन अड़े रहो, घर में ही डेट रहो। शेरनी बवाल करे, बस चुपचाप सहते रहो कोरोना काल है, बस घर में ही डटे रहो रात हो या दिन हो, गरम पानी पीया करो तुम शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो। मास्क की कमी न हो, सेनिटाइजर साथ धरो समय विकराल है, यमराज खड़े तैयार हैं घर से तुम निकले नहीं, यमराजदंड चला नहीं तुम शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो। वायरस अभी मरा नहीं, हवा भी डरा रही वैक्सीन ईजाद हो रहा, इंतजार थोड़ा ही सही यत्न कर निकाल लो, मुश्किल घड़ी ये सही तुम शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो। आस-पास खौफ है, खौफ़जदा लोग हैं आमदनी रही नहीं, खर्च ज्यों का त्यों स...

नसीब अपना अपना...

 नसीब अपना-अपना किसी ने सच कहा है साहब दुनिया में सभी लेकर आते हैं नसीब अपना-अपना....। विधिना ने जो लिख दिया तकदीर छठी की रात  मिटाए से भी नहीं मिटता लकीर खींची जो हाथ....। नसीब में होता है तो बिना माँगे मोती मिल जाता है नसीब में न होने पर माँगने से भीख भी नहीं मिलती है। ये तो नसीब का ही खेल है रात का सपना सुबह सच हो जाता है कुछ तो सपनें में ही खोये रहते हैं और जिंदगी बीत जाती है। नसीब से ही लोंगों को घर परिवार और बच्चे मिलते हैं कुछ तो सबकुछ होते हुए भी इन सबके लिए तरसते हैं...। एक ही समय पर जन्में लोगों में कोई राजा बनता है तो कोई रंक जो नसीब में है दौड़ के आता है नहीं है तो आके भी चला जाता है। ये नसीब ही तो है साहब चायवाला प्रधानमंत्री बन गया और प्रधानमंत्री का लाड़ला आज दर-दर भटक रहा...। नसीब ने फर्श से अर्श को तरासा अभावों को दूर कर जिंदगी सँवारा रेत में भी गुलशन खिला दिया ज़हालत को देख आफ़ताब ला दिया। पर ये सच है साहब नसीब भी साथ देता है  मेहनत करने वालों का बाकियों का तो बेड़ा गर्क होता है। ➖अशोक सिंह 'अक्स' #अक्स  #स्वरचित_हिंदीकविता

जब-जब मैं उसे पुकारूँ...

 जब-जब मैं उसे पुकारूँ... जब-जब मैं उसे पुकारूँ वो दौड़ी-दौड़ी चली आए आँधी हो या तूफान हो वो कभी ना घबराए...। ऐसी प्यारी निंदिया.... सभी के भाग्य में आए अकेलेपन की रुसवाई में कभी भी ना सताए...। निंदिया को मैं पुकारूँ सपनों की बाट जोहूँ सपना लगती अति सुहानी एकदम परियों सी कहानी। परियों की कहानी अलबेली जो होती है एकदम निराली संग-संग ले उड़ती रंगीली बनकर तितली चमकीली। जब-जब मैं उसे पुकारूँ वो दौड़ी-दौड़ी चली आए आँधी हो या तूफान हो संग परियों को भी लाए। वो जब भी हाँ-हाँ आती अपनी होती है पौ बारह दिन भर की थकान मिटाती फिर हो जाती नौ-दो ग्यारह। जादुई सी शक्ति मिलती परियों के संग मस्ती होती गहरी नींद में हम सो जाते तरोताज़ा हो प्रातः उठते। मुझे खुशी है निंदिया रानी तुम हो रातों की महारानी एकदम से हो औढरदानी तुमसे है जीवन की रवानी। ➖ अशोक सिंह 'अक्स' #अक्स  #स्वरचित_हिंदीकविता

एक मसीहा जग में आया.....

  एक मसीहा जग में आया.... एक मसीहा जग में आया दलितों का भगवान बना राजनीति मन को ना भाया ज्ञानसाधना ही आधार बना। निर्धनता को धता बताया छात्रवृत्ति से अरमान सजोया काला पलटन में स्थान मिला गुरू से पूरा सम्मान मिला। अर्थशास्त्र जो मन को भाया डॉक्टरेट की डिग्री दिलवाया वर्णव्यवस्था थी मन में चुभती शोध प्रबंध उस पर ही छपती। सकपाल छोड़ आंबेडकर कहलाए गुरू का आदेश शिरोधार अपनाए मानव में रक्त्त एक भाँति हैं आये स्वार्थवश सब ने जाति-पाति बनाये। छूत-अछूत को किया उजागर दिलवाया समता का अधिकार ज्ञान बढ़ा ऊँचा स्थान मिला दलितोद्धार का मार्ग प्रशस्त किया। कहते मानव-मानव एक समान रच डाले भारत का संविधान अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया आंबेडकर ने खूब नाम कमाया। दलितवर्ग का होके ब्राह्मणी से किए शादी प्रबल समाज के ठोकर से हो गई बरबादी बाबा ने अपना जीवन यों न्योछावर कर दी जाते-जाते दलितोद्धार मार्ग प्रशस्त कर दी। परिनिर्वाण दिवस लोंगों ने क्या खूब मनाया मौत की गुत्थी कोई अभी सुलझा नहीं पाया कोई कहता डायबिटीज तो कोई कहता हत्या कूटनीतिक शिकार बन गए भाई बाबा सत्या। एक मसीहा जग मे...

गुम हूँ उसके याद में....

  गुम हूँ उसके याद में.... गुम हूँ उसके याद में, जिसे चाहा था कभी गोदी में सुलाकर जिसने, दुलारा था कभी प्रसव-वेदना की पीड़ा से, जाया था कभी दुःख सहकर उसने, पाला-पोसा था कभी रात-रात भर जागकर, सुलाया था कभी। गुम हूँ उसके याद में, जिसने दुनिया में लाया था कभी अपने सपनों को तोड़-तोड़कर, जिलाया था कभी खुद भूखी रह-रहकर के, मुझे खिलाया था कभी मोह माया में फँसकर के, मुझे भुला दिया तभी बातों से मूर्च्छा आ जाती, दूरी बना लिया तभी। गुम हूँ उसके याद में, जिसनें गुमराह कर दिया वफादारी के बदले में, उसने धोखा जो दे दिया विश्वास किया था उनपे, पर विश्वासघात हो गया मेरी बातें रास नहीं आती, बर्बाद जो कर दिया ज़मीन ज़ायदाद व जान से, अपना हाथ धो लिया। गुम हूँ उसके याद में, जिसने बर्बाद कर दिया मन बढ़ाकर उसका, जीना हराम कर दिया किसका हिस्सा कैसा हिस्सा, राग क्या अलापा शरणागत में धोखा हो गया, फैला दिया फिर स्यापा मैं शिकवा करूँ क्या गैरों से, मुझे अपनों ने ही लूटा। गुम हूँ उसके याद में, जिसने बलि चढ़ा दिया जिसने जाया उसने ही, बलि का बकरा बना दिया धृतराष्ट्र बन गए पुत्रमोह में, कुल विध्वंस...

वक़्त का तराजू..

 वक़्त का तराजू वक़्त वह तराजू है साहब जो बुरे वक़्त में अपनों का वजन बता देता है पराये को साथ लाकर खड़ा कर देता है वक़्त ही वह मरहम है साहब जो गहरे से गहरे घाव को भी फौरन भर देता है और भरे हुए घाव को कुरेदकर हरा कर देता है वक़्त ही सबसे बड़ा गुरू है साहब जटिल पाठ को भी पल भर में समझा देता है मूर्ख को भी विद्वता का सरताज़ बना देता है वक़्त की तालीम अनूठा है साहब भुलाने से भी नहीं भूलता है भूले को सही वक़्त पर याद भी आ जाता है वक़्त की नजाकत समझनेवाला राज करता है दुष्काल सी परिस्थिति में भी परवाज़ भरता है वक़्त वह हमसफ़र है साहब साथ चलने वाला बुलंदियों को छूता है झोपड़े में रहकर भी महल का सुख भोगता है वक़्त का अपना इतिहास है साहब जिसने भी वक़्त को धता बताया है साहब सच कहता हूँ...... वक़्त ने सँभलने का मौका ही नहीं दिया सीधे चारो खाने चित कर दिया वक़्त तो कालजयी है साहब इतिहास पर इतिहास रच दिया चायवाले को प्रधानमंत्री बना दिया तेंडुलकर को क्रिकेट का भगवान बना दिया बच्चन को सदी का महानायक बना दिया ठाकरे को सत्ता की गद्दी दिला दिया इस जग को कोरोना के हवाले कर दिया वक़्त का भी वक़्त बदलता है साहब वक़्त को मै...

शामत मुझ पर ही आनी है....

  शामत मुझ पर ही आनी है... शादी अपनों की हो या किसी बेगाने की खर्चा उतना ही है जी श्रीमतीजी के जाने की। जब देखो तब सुनाती रहती हैं खर्च ही क्या है? खर्च ही क्या है? सुन – सुनकर कान पक गया दुकानों के चक्कर काटते-काटते सच मानों पूरा दिन बीत गया…. जेब खाली होकर क्रेडिट पर आ गया। सोचा छोड़ो अब तो झंझट छूटा तभी खनकती आवाज सुनाई दी अभी तो बाकी है घड़ी – सोनाटा गुड़िया के कानों का झुमका…. कमर का करधन भी था टूटा बस एक बिछिया भी झन्नाटा। हाय राम! बजट तो ढीला हो गया छह महीनें का कर्ज भी लद गया जानें से पहले ही बेड़ा गर्क हो गया हवाई जहाज का टिकिट जो लिया दिल तो पूरी तरह से बैठ गया…. आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया। ये क्या! सांस अब उखड़ने लगी रह रहकर त्योरियाँ भी चढ़ने लगी अचानक दोनों आँखे फड़कने लगी वो सजधजकर तैयार होने लगी…। मेरे पास आकर बोलती हैं माना कि बेगाने की शादी है पर ये हाथ रोकड़े का आदी है बस आपसे रोकड़े की मुनादी है तिजोरी पहले से ही खुलवा दी है। अपनों की बात तुम छोड़ो ये तो बेगाने की शादी है ज्यादा समान नहीं खरीदी अरमानों को भी सुला दी है। ...

भोजन के प्रकार

 भोजन के प्रकार   भीष्म पितामह ने अर्जुन को 4 प्रकार से भोजन न  करने के लिए बताया था... और किस तरह का भोजन करने के लिए बताया था ... पहला भोजन .... जिस भोजन की थाली को कोई लांघ कर गया हो वह भोजन की थाली नाले में पड़े कीचड़ के समान होती है ...! दूसरा भोजन .... जिस भोजन की थाली में ठोकर लग गई,पाव लग गया वह भोजन की थाली भिष्टा के समान होता है ....! तीसरे प्रकार का भोजन .... जिस भोजन की थाली में बाल पड़ा हो, केश पड़ा हो वह दरिद्रता के समान होता है .... चौथे नंबर का भोजन .... अगर पति और पत्नी एक ही थाली में भोजन कर रहे हो तो वह मदिरा के तुल्य होता है ..... और सुनो अर्जुन अगर पत्नी,पति के भोजन करने के बाद थाली में भोजन करती है उसी थाली में भोजन करती है या पति का बचा हुआ खाती है तो उसे चारों धाम के पुण्य का फल प्राप्त होता है .. अगर दो भाई एक थाली में भोजन कर रहे हो तो वह अमृतपान कहलाता है चारों धाम के प्रसाद के तुल्य वह भोजन हो जाता है .... और सुनो अर्जुन ..... बेटी अगर कुमारी हो और अपने पिता के साथ भोजन करती है एक ही थाली में तो उस पिता की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती .... क्...

अबला की चाह

 अबला की चाह चाह नहीं मैं अनपढ़ गँवार रह अनजान के माथे थोपी जाऊँ बस चाह नहीं मैं बीज की तरह जब जहाँ चाहे वहाँ बोयी जाऊँ चाह नहीं सूत्र बंधन की भी बंधि दहेज प्रथा की बलि चढ़ी जाऊँ बस चाह नहीं है इस जग में अधिकारों से वंचित रह जाऊँ....! चाह मेरी बस इतनी सी है... बाला बनकर जनमूं जग में जीने का हो अधिकार मेरा दादा-दादी की गुड़िया बनकर भाई की उँगली को पकड़कर माँ-बापू का प्यार मैं पाऊँ घर भर में मैं दुलारी जाऊँ विपदा में मैं वारी जाऊँ.... बस इतना मुझे अधिकार मिले...। हर बाला जो जन्में इस जग में उसे जीने का अधिकार मिले गोदी से लेकर गद्दी तक हर जगह उसे सम्मान मिले बाला वंचित न हो अधिकारों से ऐसा घर-वर सहज समाज मिले लक्ष्मी-दुर्गा सी पूजी जाए ऐसा कुल परिवार खानदान मिले...। अक्स पूछें हैं दुनिया वालों क्यों नफरत बाला से करते हो...? है वो भी तुम्हारे खून का कतरा फिर भी गर्भपात की सोचे हो क्या मन में इच्छा नहीं होती है..? उसकी तोतली बोली सुनने को अभयदान बाला को कर दो हर गुड़िया को जीने दो....। बस अरदास मेरी इतनी सी है जिस घर में बेटी का कदर न हो उस घर में कोई बाप बेटी न ब्याहै जो कोख में मारे हैं ब...

सवेरे - सवेरे उठकर देखा

  सवेरे - सवेरे उठकर देखा सुनहरी किरण छिटके देखा चिड़िया अभी-अभी थी आई नव सृष्टि की गीत सुनाई। मन भी उमंग जोश से भरा हर पल लगता था सुनहरा सुगंधित संगीतमय वातावरण अंधकार के पट का अनावरण। मैंने किरणों से कहा, मुझे थोड़ी सी ऊर्जा दोगी चिड़िया से कहा, गाने का तजुर्बा दोगी नव किसलय दल से कहा, जीवन स्नेह से भर दोगी फूलों की खुशबू से कहा, हर्षोल्लास से भर दोगी...! हाँ - हाँ की प्रतिध्वनि, जैसे हाँ - हाँ भर दूँगी...! स्वर अचकाया था भावुकता से लड़खड़ाया था..! अनुभव से परे का व्यवहार जीवन प्रकृति का प्यार। जो भाग्यशाली कर्मवीर हो त्याग नींद जल्दी उठते हों...! बेफिक्र हो दुनिया में जीते हों वे ही जीवन में आनंदरस पीते हैं अनकहा व अनसुनी स्वर सुनाई दी मुझे इसकी है परम आवश्यकता। सवेरे की शीतल हवा जैसे हो अमरता की दवा घासों की हरियाली जैसे जीवन की खुशहाली। ऐसे ही मिलती है मुट्ठी भर जीने की आस भरता गजब का उल्लास अँधियारा छट मिलता उजास। मैं धन्य-धन्य हो उठा बंधुवर कृतज्ञ हो उठता हूँ आज पा ऊर्जा, तजुर्बा, स्नेह व ख़ुशीहाली बिन माँगे मिलती हैं चीजें निराली सुकून व अस...

गिरनार की चढ़ाई (संस्मरण)

  गिरनार की चढ़ाई (संस्मरण) समय-समय की बात होती है। कभी हम भी गिरनार की चढ़ाई को साधारण समझते थे पर आज तो सोच के ही पसीना छूटने लगता है। आज से आठ वर्ष पूर्व एक विशेष राष्ट्रीय एकता शिविर (Special NIC Camp) में महाराष्ट्र डायरेक्टरेट का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। पूरे बारह दिन का शिविर था। मेरे साथ दस SD कैडेट्स और सात SW कैडेट्स ने हिस्सा लिया था। जनवरी का महीना था, हल्का गुलाबी ठंड पड़ रही थी। वैसे वहाँ पर भी ठंडी में भी तापमान लगभग 17℃ ही था। इसलिए कुछ विशेष परेशानी नहीं हुई। इस तरह के शिविरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों व दार्शनिक स्थलों के भ्रमण पर ही विशेष जोर दिया जाता है। तीसरे दिन से ही प्रतियोगिताएँ शुरू हो गई थी। पूरे भारत से कुल सत्रह डायरेक्टरेट ने हिस्सा लिया था। हमारा बेस कैम्प जूनागढ़ में था। इसके आस-पास के इलाके हमने भ्रमण के लिए शामिल किए थे। जिसमें सोमनाथ मंदिर, द्वारिकापुरी, जूनागढ़ किला, गिरनार की ट्रेकिंग और गिरि सफारी मुख्य रूप से शामिल था। वैसे तो ऐसे शिविर मजेदार होते हैं और यादगार बन जाते हैं। गिरनार की चढ़ाई के एकदिन पहले डिनर के समय मेस में केरला की जीसी...

भारत का स्विट्जरलैंड

  भारत का स्विट्जरलैंड एक लंबे अरसे के बाद मातारानी के यहाँ से बुलावा आ ही गया। हमनें मातारानी वैष्णोदेवी का दर्शन करने के पश्चात  दूसरे दिन हमनें कटरा से ही अगले सात दिन के लिए ट्रैवलर फोर्स रिजर्व कर लिया था। कटरा से सुबह हम सब डलहौजी के लिए रवाना हुए थे। नवंबर माह का अंतिम सप्ताह चल रहा था। सैलानियों का जबरदस्त जमावड़ा था। जम्मू माधोपुर वाया पठानकोट होते हुए हम लोग शाम सात बजे के लगभग डलहौजी पहुँचे थे। सफर के दौरान सिर्फ नाश्ता, दोपहर के भोजन के लिए रुके थे। हाँ, और एक जगह चिंचवटी माता के मंदिर का दर्शन करने के लिए रुके थे, नहीं तो पूरे बारह घंटे का सफर। उफ! कितना घुमावदार रास्ता। हम कुल मिलाकर नौ लोग थे। जिसमें से दो लोंगों को छोड़कर बाकी सभी को उल्टियाँ होने लगी थी। डलहौजी में सुभाष चौक के पास होटेल बुक किया गया था पर सुविधाजनक न होने के कारण हमनें वहाँ से खज्जियार के लिए कूच कर दिया। लक्कड़मंडी होते हुए अँधेरी रात में घुमावदार-चक्करदार सड़क से होते हुए रात साढ़े दस बजे खज्जियार पहुँचे थे। वहीं एक होटेल में मुकाम किया गया। तीन कमरे में हम नौ लोग ठहरे थे। वैसे देखा जाए तो पूर...

अनमोल वचन ➖ 5

  अनमोल वचन ➖ 5 दीप से दीप की ज्योति जलाई, दिवाली की ये रीति निभाई एक कतार में रखि के सजाई, फिर सब कुशल क्षेम मनाई। पाँच दिनों का त्योहार अनोखा, भाऊबीज तक सजे झरोखा पकवानों का खुशबू हो चोखा, हर कोई रखता है लेखा-जोखा। धनतेरस की बात निराली, करते हैं सब अपनी जेबें खाली कोई खरीदे सोना-चाँदी तो, कोई बर्तन शुभ दिवाली। दीप जलाकर करें हैं निवेदन, अंधकार मिटि जाए घन स्वास्थ्य समृद्धि का लाभ मिले, बना रहे सुखमय जीवन। नरकचतुर्दशी का दीप जलाकर, यम की करें सेवकाई अकाल काल से छुटकारा पाकर, फिरि जग की करे भलाई। लक्ष्मी पूजन और सिद्धि आराधना, अमावस्या की रात का सपना तन मन से जो करे पूजा अर्चना, धन दौलत और पाए खजाना। मंगलमय हो तुम्हरी दिवाली, यही है मेरी अरदावली धन आरोग्य संपदा मिली, सुधरे घर की हालत माली। जैसी सोच वैसी हो प्राप्ति, साधु संत या नर हो भोगी दुर्भावना त्याग ज्यों करे, संवरे जीवन बनि जाए योगी। मानव सम कोई जीव नहीं, हो जो परमारथ में लीन इहलोक परलोक सुधरि जाये, त्यागे स्वार्थ भावना हीन। दिवाली सम पर्व नहीं, अँधियारे को देत भगाय प्रकाश पर्व की रात यही, अँधियारा जात नशा...

जननायक बिरसा मुंडा

  जननायक बिरसा मुंडा वै से तो हम हजारों समाजसुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, उनका जन्मदिन मनाते हैं। पर कुछ ऐसे होते हैं जो अल्पायु जीवनकाल में ही महान कार्य कर जाते हैं पर उनको स्मरण करना सिर्फ औपचारिकता रह जाती है या फिर क्षेत्रीय  स्तर पर ही उनकी पहचान सिमटकर रह जाती है। आज मैं बात कर रहा हूँ एक ऐसे समाजसुधारक  व स्वतंत्रता सेनानी का जो शहादत देकर अमर हो गया, जिसका नाम 'बिरसा मुंडा था। बिरसा मुंडा ने सिर्फ 25 वर्ष की अल्पायु जीवनकाल में अंग्रेजों के नाक में ऐसा दम कर दिया कि उन्होंने जेल में ही विष अर्थात जहर देकर बिरसा मुंडा की जीवनलीला समाप्त कर डाली। आओ हम सब बिरसा मुंडा के बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम सुगना पूर्ति (मुंडा) और माता का नाम करमी पूर्ति (मुंडाइन) था। जो राँची के पास उलिहातू गाँव के थे। अपने समाज की दुर्दशा से आहत रहा। वे हमेशा शासकों द्वारा की गई सौतेलेपन व शोषण के व्यवहार व बुरी दशा पर सोचते रहते थे। इसी सिलसिले में 1 अक्टूबर 1894 को मात्र 19 व...

आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ

  आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ दीप बनाने वालों के घर में भी दीये जलाएँ चीनी हो या विदेशी हो सबको ढेंगा दिखाएँ अपनों के घर में बुझे हुए चूल्हे फिर जलाएँ अपनें जो रूठे हैं उन्हें हम फिर से गले लगाएँ। आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ जो इस जग में जगमग-जगमग जलता जाए जो अपनी आभा को इस जग में नित फैलाए जो जग में फैले अंधकार अज्ञान को नित्य मिटाए जो घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, दलबंदी को दूर भगाए। आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ सबके दिल का रूठा अँधियारा मिट जाए दीप ज्योति सी जग में अपना अनुराग बढ़ाए जनजन के मन में पनपे वैमनस्य भाव मिटाए आओ मिलकर निर्धन को भी पकवान खिलाएँ। आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ जिसके लौ में धर्म-जाति का मतभेद मिटाएँ अमन-चैन सुख-शांति का चहु ओर संदेश फैलाएँ आओ मिलकर जग के कल्याण का गुहार लगाएँ आरोग्य-स्वास्थ्य सम्पदा को जग में फैलाएँ। आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ  स्वार्थी नेताओं के चंगुल से हम देश बचाएँ मंदिर मस्जिद की चालों से गुमराह न होने पायें नस्लवाद के भस्मासुर से जनमानस को बचाएँ आओ मिलकर हम भारत को भारतवर्ष बनाएँ। ➖ अ...

शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व

 शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक के व्यवसाय का ऐसा ही महत्त्व है जैसे कि ऑपरेशन करने के लिए किसी डॉक्टर अर्थात सर्जन का महत्त्व होता है। शिक्षक सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि राष्ट्र की भी धूरी है। समाज व राष्ट्र सुधार और निर्माण के कार्य में उसकी महती भूमिका होती है। शिक्षक ही शिक्षा और शिष्य के उद्देश्य पूरे करते हैं। इसलिए किसी भी शिक्षा प्रणाली या शिक्षा योजना की सफलता या असफलता शिक्षा क्षेत्र के सूत्रधार शिक्षकों के रवैये और उनके व्यवहार पर निर्भर करती है। भारत सरकार द्वारा लागू की गई सभी शिक्षा नीतियों व योजनाओं में शिक्षकों की भूमिका के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। जैसे कोठारी आयोग की रिपोर्ट (1964-66), शिक्षा नीति (1968), शिक्षा पर पंच वर्षीय योजना की रिपोर्ट और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) – में शिक्षक के व्यवसाय के महत्व की पहचान की गई है। इतना ही नहीं हालही में घोषित राष्ट्रीय शिक्षानीति -2020 में भी शिक्षकों की भूमिका और नवोपचार को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। किसी भी राष्ट्रीय शिक्षानीति या योजनाओं की सफलता शिक्षकों के सक्रिय क्रियान्वयन व ...

अनमोल वचन ➖ 4

 अनमोल वचन ➖ 4 दाता इतना रहमिए, कि पालन-पोषण होय पेट नित भरता रहे, अतिथि सेवा भी होय। दीनानाथ हैं अंतर्यामी, सहज करें व्यापार बिना तराजू के स्वामी, करें हैं सम व्यवहार। सबकुछ तेरा नाम प्रभु, इंसा की नहीं औकात पल में राजा तू बनाए, पल में रंक बनि जात। नाथ की लीला निराली,क्या स्वामी क्या माली बाग की रक्षा माली करे, जग की रक्षा स्वामी। एक कड़ी जुड़े दूजे से, नर नर से करे मिताई कृपा भये जगबंधन छूटे, जग की करे भलाई। भगवन के रंग रूप में, सब घट रही समाय जैसे फूलों के रंगरूप में,खुशबू लखि न जाय। ➖ अशोक सिंह 'अक्स' #अक्स

कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है

 'कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है' कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है। जहाँ एक तरफ दावा किया जा रहा था कि अब कोरोना का खात्मा होने को आया है और सबकुछ खोल दिया गया, भले ही कुछ शर्तें रख दी गई। हमेशा सरकार प्रशासन सूचना जारी करने तक को अपनी जिम्मेदारी मानती है और उसीका निर्वहन करती है। जैसे सिगरेट के पैकेट पर लिख दिया जाता है कि 'सिगरेट का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।' ठीक इसी तरह से सभी प्रकार के तंबाखू, धूम्रपान सामग्री और मादक द्रव्यों पर लिख दिया जाता है और ये मान लेते हैं कि उनका कार्य व दायित्व पूर्ण हो गया। तो क्या सच में इतने से ही प्रशासन का दायित्व पूरा हो जाता है। जवाब होगा जी बिल्कुल नहीं…. दरअसल यह तो सूचना जारी करके जिम्मेदारियों से दूर भागना हुआ.. और नहीं तो क्या..? जबतक वैक्सीन नहीं आ जाती और व्यापक रूप से प्रत्येक की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाता तबतक खुले में घूमने की छूट देने और सबकुछ खोल देना बिल्कुल उचित नहीं है। बिना पुख्ता इंतजाम व व्यवस्था के स्थिति को सामान्य करने का ही नतीजा है कि गुड़गांव में कोरोना का कहर देखने को मिल रहा है। अभी सबकुछ ...

आर्गेनिक खेती और हैड्रोपोनिक खेती का बढ़ता चलन

ऑर्गेनिक खेती और हैड्रोपोनिक खेती का बढ़ता चलन हालही में मैंने 4 नवंबर, 2020 के अंक में छपा एक लेख पढ़ा जिसका शीर्षक था 'लेक्चरर की नौकरी छोड़ बनें किसान' मिट्टी नहीं पानी में उगती हैं फल और सब्जियाँ। यह कारनामा गुरकीरपाल सिंह नामक व्यक्ति ने कर दिखाया। जो एक कंप्यूटर इंजीनियर थे और लेक्चरर पद पर नौकरी करते थे। उन्होंने नौकरी छोड़कर खुद को खेती के प्रति समर्पित कर दिए। वे आजकल हैड्रोपोनिक तरीके से सब्जियाँ उगा रहे हैं, जो काबिलेतारीफ है। मैं आपका ध्यान इस तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ जो विसंगति के रूप में हमारे समाज में व्याप्त है कि शिक्षित व्यक्ति खेती करे..... कदापि नहीं..? ऐसी सोच रखनेवालों के मुँह पर सीधा तमाचा जड़ा है भाई गुरकीरपाल सिंह ने। ये पहल आज के युवापीढ़ी के लिए अवश्य लाभकारी होगा क्योंकि जिस गति से आबादी बढ़ रही है और कृषि का अनुपात कम हो रहा है। ऐसे में कम जगह में खेती का प्रचलन बढ़ रहा है और उत्तम खेती की आवश्यकता है। जिसमें पुरानी परिपाटी से किए जाने वाले खेती को छोड़कर नई तकनीकी और पद्धतियों को अपनाया जा रहा है। इतना ही नहीं आजकल तो आर्गेनिक खेती का भी चलन बहुत जोरो ...