सागर की लहरें....
सागर की लहरें... सागर की लहरें किनारे से बार-बार टकराती चीखती उफान मारती रह-रहकर इतराती मन की बेचैनी विह्वलता साफ झलकती सदियों से जीवन की व्यथा रही छिपाती पर किनारे पहुँचते ही शांत सी हो जाती वह अनकही बात बिना कहे लौट जाती अपने स्पर्श से मन आल्हादित कर जाती संग खेलने के लिए उत्साहित हो उकसाती जैसे ही हाथ बढ़ाता छूकर चली जाती वहाँ बैठे रहने का एक वजह छोड़ जाती। इक शाम मुझे देखकर थोड़ी सी मुस्कुरायी किनारे बैठा देखकर पास तक चली आयी अकेले मेरे साथ बतियाने में जरा शरमाई बलखाती लहराती चाल से थोड़ा भरमाई चिंतित तन्मय भाव को भाँप कर फरमाई यों अकेले में उदास क्यों बैठे हो मेरे भाई न कोई साथी दोस्त अरे कहाँ गई भौजाई चेहरे की उदासी बयां कर दी हुई लड़ाई दिनरात की किचकिच ने ही बात बढ़ाई वहाँ बैठे रहने का उसे वजह समझ में आई। आजकल लोंगों का नजरिया बदलने लगा माँ-बाप के प्रति बेटे का रवैया बदलने लगा शादी के बाद फौरन चूल्हा अलग होने लगा जोरू के चक्कर में परिवार बिखरने लगा भाई-भाई के बीच का मनमुटाव बढ़ने लगा राम-लक्ष्मण का वह मिसाल अब मिटने लगा राम के लिए भरत का त्याग भी बिसरने लगा श्रवण कुमार...