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सागर की लहरें....

 सागर की लहरें... सागर की लहरें किनारे से बार-बार टकराती चीखती उफान मारती रह-रहकर इतराती मन की बेचैनी विह्वलता साफ झलकती सदियों से जीवन की व्यथा रही छिपाती  पर किनारे पहुँचते ही शांत सी हो जाती वह अनकही बात बिना कहे लौट जाती अपने स्पर्श से मन आल्हादित कर जाती संग खेलने के लिए उत्साहित हो उकसाती जैसे ही हाथ बढ़ाता छूकर चली जाती वहाँ बैठे रहने का एक वजह छोड़ जाती। इक शाम मुझे देखकर थोड़ी सी मुस्कुरायी किनारे बैठा देखकर पास तक चली आयी अकेले मेरे साथ बतियाने में जरा शरमाई बलखाती लहराती चाल से थोड़ा भरमाई चिंतित तन्मय भाव को भाँप कर फरमाई यों अकेले में उदास क्यों बैठे हो मेरे भाई  न कोई साथी दोस्त अरे कहाँ गई भौजाई चेहरे की उदासी बयां कर दी हुई लड़ाई दिनरात की किचकिच ने ही बात बढ़ाई वहाँ बैठे रहने का उसे वजह समझ में आई। आजकल लोंगों का नजरिया बदलने लगा माँ-बाप के प्रति बेटे का रवैया बदलने लगा शादी के बाद फौरन चूल्हा अलग होने लगा जोरू के चक्कर में परिवार बिखरने लगा भाई-भाई के बीच का मनमुटाव बढ़ने लगा राम-लक्ष्मण का वह मिसाल अब मिटने लगा राम के लिए भरत का त्याग भी बिसरने लगा श्रवण कुमार...

कोविड की तानाशाही...

 कोविड की तानाशाही हम कहते हैं बुरा न मानो मुँह को छिपाना जरूरी है अपनेपन में गले न लगाओ दूरियाँ बनाना जरूरी है कोरोना महामारी तो एक भयंकर बीमारी है कहने को तो वायरस है पर छुआछूत बीमारी है हट्टे कट्टे इंसानों पर भी  एक अकेला भारी है आँख मुँह और नाक कान से करता छापेमारी है एक पखवाड़े के भीतर ही अपना जादू चलाता है कोरेन्टाइन के भीतर ही  अपना ये धौस जमाता है गला फेफड़ा श्वासनली को अपनी गिरफ्त में लेता है बीड़ी सिगरेट व गुटकावालों को सीधे यमलोक पहुँचाता है मधुमेह हार्ट के रोगी को तो जन्नत का सैर कराता है निर्धन धनपति या हो चिकित्सक भेद-भाव नहीं करता है महलों में रहने वालों का  ये जेब टटोला करता है कोई कहता मानव निर्मित जैविक हथियार बताता है कोई बोले बहुरूपिया है रूप बदलता जाता है चीन अमेरिका इटली फ्रांस को नाकों चने चबवाया है कब्रिस्तान भी छोटा पड़ गया इतना लाश गिराया है मोदी डर गए योगी डर गए डर गई दुनिया सारी लॉक डाउन का ऐलान हुआ तो डर गए सारे व्यापारी ट्रेन रुक गई प्लेन रुक गई रुक गई आवाजाही कितने बेरोजगार हो गए खतरे में नौकरशाही पूरे विश्व पर राज किया वो कोविड - 19 की तान...

मैं सड़क.....

  मैं सड़क … अरे साहब कोरोना महामारी के कारण फुर्सत मिली आपबीती सुनाने का मौका मिला। सदियों से सेवाव्रती दिन-रात सजग तैनात सीनें पर सरपट दौड़ती  गाड़ियों का अत्याचार। हाँ साहब.. 'अत्याचार' तेजगति से बेतहाशा चीखती - चिल्लाती भागती गाड़ियाँ..। क्षमता से अधिक बोझ लादे… आवश्यकता से अधिक रफ़्तार में भागती गाड़ियाँ...। मेरे चिथड़े उड़ जाते हैं दरारे आ जाती हैं बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं पूरी तरह टूट जाता हूँ...। पीडब्लूडी वाले आते हैं मरम्मत कर जाते हैं मरम्मत क्या..थूकपट्टी.. मतलब मरहम पट्टी लगा जाते हैं। शुक्र हो विज्ञान और तकनीकी का डामरीकरण होने लगा  वरना धूल - मिट्टी से तो मेरा दम घुटने लगता था। बारिश में तो गज़ब का नज़ारा होता  गड्ढे में पानी होता या पानी में गड्ढा परखना आसान नहीं था। समय ने करवट लिया जमाना नई तकनीकी का आया सीमेंटीकरण कांक्रीट धूल-धक्कड़ से छुटकारा मिला। पर साहब स्थिति और बदतर होते मैंनें इन्हीं आँखों से देखा है गाड़ियों के साथ-साथ इंसानों के भी परखच्चे उड़ते देखा है। सड़क अच्छी होने पर इंसान बेकाबू हो जाता है सरपट गाड़ी को दौड़ाता है जैसे यमराज के पास जाने की जल्दी ...

वक़्त अच्छा हो तो....

 वक्त अच्छा हो तो…. कोरोना काल में अंतर्मन ने पूछा - इस दुनिया में तुम्हारा अपना कौन है..? सवाल सुनते ही एक विचार मन में कौंधा माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी… बेटा - बेटी या फिर मित्र.. किसे कहूँ अपना..? यदि वक़्त अच्छा हो तो जो अदृश्य है सर्वशक्तिमान है सर्वव्यापी है वो भी अपना है  तब सब कुछ ठीक है। वक़्त अच्छा हो तो माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी बेटा-बेटी या फिर मित्र सब अपने होते हैं अपना - अपना होता है पराया भी अपना होता है। वक़्त अच्छा हो तो राजा भी सम्मान देता है रंक भी सलामी ठोकता है हर सपना पूरा होता है कामियाबी को भी  कदम चूमना पड़ता है। वक़्त अच्छा हो तो हाथ की मिट्टी भी सोना बन जाती है मोमबत्ती भी मशाल बन जाती है बंदर भी लंगूर बन जाता है कोयला भी कोहिनूर बन जाता है। वक़्त अच्छा हो तो गद्दार भी वफादार बन जाता है सूबेदार भी सरदार बन जाता है चंदा भी मामा बन के आता है दूध पिलाकर फौरन चला जाता है। वक़्त अच्छा हो तो भाग्य सँवर जाता है दुर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है सद्गुरु का साथ भी मिल जाता है भवसागर से बेड़ा पार भी लग जाता है। वक़्त अच्छा हो तो मौत भी लौटकर चली जाती है गोली कान को...

मेहतर....

  मेहतर…. साहब अक्सर मैंने देखा है अपने आस-पास बिल्डिंग परिसर व कालोनियों में काम करते मेहतर पर डाँट फटकार सुनाते लोंगों को जिलालत करते मारते भर नहीं पार कर देते हैं सारी हदें थप्पड़ रसीद करने में भी नहीं हिचकते। सच साहब किसी और पर नहीं बस उसी मेहतर पर जो साफ करता है उनकी गंदगी बीड़ी सिगरेट की ठुंठें बियर शराब की खाली बोतलें प्लास्टिक फाइबर की गिलासें अधखाया तंदूर दबे कुचले अंगूर सब्जी फलों के छिलकें बदबूदार बिरयानी के डिब्बे। और क्या साहब गरीबों का मुँह चिढ़ाता फटा पुराना मुँह बाया जूता चमरौधा सैंडिल और चप्पल मिठाइयों के डिब्बे और पत्तल पूरे तन मन से सफाई करता सुबह शाम मिलते सलामी देता सम्मान का पूरा हकदार होता पर हिस्से में क्या मिलता..? तानें और झिड़कियाँ पगार न देने की धमकियाँ। तंग हो चुका हूँ ...साहब सुन सुनकर तानें और फटकार पगार न देनें की धमकी सरकार आखिर क्यों…? पापी पेट का सवाल है.. वे नाक बंद कर के निकालते हैं घर से बाहर हम सिर पर उठाकर ले जाते हैं बस्साते कूड़े कचरे को कोई गंदगी फैलाता है पर मेहतर ही साफ करता है...। खैर छोड़ो साहब.. मानवता खो गई है चंद पैसों की चकाचौंध में शूट ...

जय बोलो प्रभु श्री राम की...🚩

जय बोलो प्रभु श्री राम की...🚩 जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की पावन नगरी के उस महिमा की तुलसीदास जी के गरिमा की जो जन्म भूमि कहलाता है त्रेतायुग से जिसका नाता है सुनि रामराज्य मन भाता है। जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की जग के पालनहारी श्री राम बिगड़ी सबके बनाते काम भ्राता भरत के सबकुछ राम अहिल्या के जीवनदाता राम केवट के तो विधाता राम। जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की शबरी के तो लाड़ले राम चखि-चखि के बेर खिलाये राम लक्ष्मण को प्राण प्रिय हैं राम ऋषि मुनियों के तो चहेते राम खरदूषण के बधकर्ता हैं राम। जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की हनुमान के मन में बसते हैं राम सुग्रीव सहायक बने वो राम बाली के प्राणहर्ता हैं राम कपिराज के परममित्र श्री राम जटायु के मोक्ष दायक श्री राम। जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की रामेश्वरम तीर्थ स्थापक राम रामसेतु निर्माता राम असुर निकन्दन जय श्री राम रावण के संहारक राम विभीषण के हैं तारक राम। जय बोलो प्रभु श्री राम की अयोध्या नगरी दिव्य धाम की हिंदुओं के प्राणविधाता राम...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर... जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर तो जिओ जमकर… जीवन जिंदादिली का नाम है मुरदादिल क्या खाक जीते हैं...।आओ इसे समझने के लिए आगे बढ़ते हैं। वैसे तो गौतम बुद्ध से जुड़ी हुई कई कथाएं हैं, जो हमें जीवन के बहुत गहरे संदेश देती हैं। ऐसी ही एक कथा है बुद्ध और गौतमी की। बुद्ध के समय में श्रावस्ती नगरी में एक कृशा गौतमी नामक महिला रहती थी। उसका एक बेटा था, जो अचानक बीमार होकर मर गया। कुछ समय पहले ही उसके पति का भी देहांत हुआ था। उस पर जैसे दुख का पहाड़ टूट पड़ा। पति की मृत्यु के बाद वह बेटे के आसरे ही जी रही थी। गौतम बुद्ध उसी नगर के पास रुके हुए थे। लोगों ने महिला को समझाया – रोओ मत, इतना दुखी मत हो। तुम बच्चे को बुद्ध के पास क्यों नहीं ले जाती। वे बहुत दयालु हैं। वह इसे फिर से जीवित कर देंगे। महिला बच्चे के शव के साथ भागी-भागी बुद्ध...